*सुनो..
आज से..
अभी से..
मैं बंद करती हूँ..
अपने ह्रदय की..
वो किताब..
समेटती हूँ..
पन्नों को..
खुरच खुरच कर मिटाती हूँ..
लहू की रोशनाई से लिखा..
तुम्हारा वो नाम..
बंद करती हूँ..
हर वो ..
खिड़की,दरवाजे..
रोशनदान..
जहाँ से चली आती थी..
तुम्हारी याद..
अपनी मर्ज़ी से..
बेमौसम हवाओं की..
तरह..
और हिला जाती..
मेरा अस्तित्व..
साथ में लाती..
यहाँ वहां से..
अर्जित की हुई..
तुम्हारे पुरुषजन्य दुर्बलताओं..
की धुल गर्द..
जो, प्रदूषित कर देतीं..
मेरे जतन से..
लीपे पोते..
संवारे गए..
देवालय सरीखे..
ह्रदय के प्रांगण को..
आज भी..
जहाँ स्थापित..
वही इकलौती..
मंजुल मूर्ती..
लेकिन..
अब,मर चुकी..
संवेदना..
श्रद्धा,आस्था..
और अमिट विश्वास..
मुक्त करती हूँ..
मैं तुम्हें..
अपने आस्था ऋण से
स्वतंत्र हो तुम..
उन्मुक्त हवाओं से..
हर खिड़की,दरवाजों..
रोशनदान से जो..
जाने को आतुर..
अब से........
जीती हूँ श पा. ..
मैं नि:श्वास..
किन्तु..
स्वावलंबी..
मेरा अपना जीवन..
जो है..
स्वयं अधिष्ठाता..
स्वयं भू..
स्वयं की इच्छाओं का...*

just great...
ReplyDeletealways a fan of your's . My pleasure
ReplyDeleteवाह .. बेहतरीन ..
ReplyDeleteबड़ा गलत कर दिया आपने यह लिख कर की ..
कृपया 'पंक्तियाँ/भाव/कविता' न चुराएँ...बहुत कष्ट होता है...बहुत मेहनत से लिखती हूँ...
वर्ना आज आपकी रचना चोरी हो जाती .. :) :) :)
Bibin John.
बडुत सुन्दर रचना
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