Thursday, 19 December 2013

* जिन दिनों बदन से  आती थी भीगे कुल्हड़ सी खुश्बू  ।
तुमने थोड़ा-थोड़ा तोड़  चखा  
और   … अंत में पटक तोड़ा ज़मीन पर
चलो अच्छा रहा। … जो जहाँ का था वहाँ पहुंचा। .......(श.पाण्डेय )*

2 comments:

  1. कुल्हड़ के ख्यालात,
    क्या बात क्या बात क्या बात ;)

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