* जिन दिनों बदन से आती थी भीगे कुल्हड़ सी खुश्बू ।
तुमने थोड़ा-थोड़ा तोड़ चखा
और … अंत में पटक तोड़ा ज़मीन पर
चलो अच्छा रहा। … जो जहाँ का था वहाँ पहुंचा। .......(श.पाण्डेय )*
तुमने थोड़ा-थोड़ा तोड़ चखा
और … अंत में पटक तोड़ा ज़मीन पर
चलो अच्छा रहा। … जो जहाँ का था वहाँ पहुंचा। .......(श.पाण्डेय )*
बहुत सुंदर
ReplyDeleteकुल्हड़ के ख्यालात,
ReplyDeleteक्या बात क्या बात क्या बात ;)