Thursday, 6 March 2014

*क्यूँ कोई अपनी बेकसी का तमाशा देखे .. 
जब जहाँ देखे तो बस कद में इज़ाफ़ा देखे 

हँसते-रोते रहेंगे अपने पैरहन भीतर
कह दो टांकों से की रेशम का सरापा देखे

नोच के रूह से धागे जो ज़ीस्त बुनते हैं 
आ,के नायाब कारीगर का तमाशा देखे 

थोड़ी मिट्टी,हवा,पानी से गुज़र है अपना 
आग ज़ज्बातों के चूल्हे में ज़रा सा देखे 

नज़र कि दूरी से कसक कि उम्र बढ़ती है 
'शपा' आँखों का दिल के नाम लिफाफा देखे ….... (श पाण्डेय )*

No comments:

Post a Comment