* एकदम पीछा छुड़ाना चाहती थी … इसलिए पिछले बरस दीवाली पर
दलिद्दर कि जगह सूप बजा-बजा खेद आयी 'भाव' …
बैलों कि किलनी जैसे जब देखो तब चिपटे बैठे रहते थे मन में …।
खेद आयी सीवान पार … बिना पलट के देखे कहीं फिर न धर ले ये कविताई का बैताल …
अब ,मैं भावहीन हूँ …
मस्ती से गहती हूँ गिरहस्थी …लेकिन जब भावशून्य कुशल गिरहस्थन सी …
गूंथती हूँ आटा तो हैं क्यूँ सन जाते भाव ।
बेलती हूँ रोटियां और फूलती हैं गज़लें ।
छीलती हूँ तरकारी और उतरता है अतीत का छिलका।
लगाती हूँ बघार दाल में और,
खुश्बू से भर जाती है नीली/काली स्याही ।
तहाती हूँ चादरें … गिलाफ़े। .
फड़फड़ाते हैं कोरे पन्ने …
बच्चे को सुलाती हूँ करवट ।
और,भीतर अंगड़ाई लेती है नज़्म …
सूखे पतझड़ में धूल संग बुहार आयी थी जो सूखी पीली पड़ी संवेदना। ।
माघ बीतते फिर हरियाने लगी है क्यारी में …
मीठी नीम के पत्तों संग इसको भी तोड़ा ,पकाया ,खाया …
जो पचता वो सेहत बनाता ....
भाव कभी नहीं पचते … इसीलिए अब गाल के तिल जैसे …
अनायास उग आये हैं चेहरे पर …
हाँ,उसने कहा था कभी की …… 'तुम्हारी ठोड़ी के पास का तिल बहुत खूबसूरत है ' …
फरार का कोई तो रास्ता होगा ? ……(श पाण्डेय )*
दलिद्दर कि जगह सूप बजा-बजा खेद आयी 'भाव' …
बैलों कि किलनी जैसे जब देखो तब चिपटे बैठे रहते थे मन में …।
खेद आयी सीवान पार … बिना पलट के देखे कहीं फिर न धर ले ये कविताई का बैताल …
अब ,मैं भावहीन हूँ …
मस्ती से गहती हूँ गिरहस्थी …लेकिन जब भावशून्य कुशल गिरहस्थन सी …
गूंथती हूँ आटा तो हैं क्यूँ सन जाते भाव ।
बेलती हूँ रोटियां और फूलती हैं गज़लें ।
छीलती हूँ तरकारी और उतरता है अतीत का छिलका।
लगाती हूँ बघार दाल में और,
खुश्बू से भर जाती है नीली/काली स्याही ।
तहाती हूँ चादरें … गिलाफ़े। .
फड़फड़ाते हैं कोरे पन्ने …
बच्चे को सुलाती हूँ करवट ।
और,भीतर अंगड़ाई लेती है नज़्म …
सूखे पतझड़ में धूल संग बुहार आयी थी जो सूखी पीली पड़ी संवेदना। ।
माघ बीतते फिर हरियाने लगी है क्यारी में …
मीठी नीम के पत्तों संग इसको भी तोड़ा ,पकाया ,खाया …
जो पचता वो सेहत बनाता ....
भाव कभी नहीं पचते … इसीलिए अब गाल के तिल जैसे …
अनायास उग आये हैं चेहरे पर …
हाँ,उसने कहा था कभी की …… 'तुम्हारी ठोड़ी के पास का तिल बहुत खूबसूरत है ' …
फरार का कोई तो रास्ता होगा ? ……(श पाण्डेय )*
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